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NONSTOP LIVE STAGE SHOW SINGER PRAKASH RAWAT DIWAN SAUN YOGENDRA BISHT

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Uttarakhandi Folk Singer Prakash Rawat NonStop Culture and Traditions Of Uttarakhand Uttarakhand of religious customs, richness of wildlife heritage, exotic mountains makes Uttarakhand a perfect representation of Indian cultural tradition. Uttarakhand has a cultured and colourful society. Uttarakhand has every thing that any tourist could want. The most significant donor for giving mass appeal to tourism in Uttarakhand is the state’s rich culture, an excellent intermingling of exoticism as well as the way of life. Frequently thought-out to be the belt of Hindu culture, the Uttarakhand’s culture is beyond doubt one of the most vital tourist attractions of Uttarakhand.The Uttarakhandi culture are its history, people, religion and dances. All of them are a beautiful amalgamation of different influences from all the races and dynasties it has been ruled by. Its history is chequered in comparison to the arts culture but still interesting enough to hold a person’s consideration. Its dances ...

बेडु पाको मसकबीन धुन पर छलिया नृत्य उत्तराखंड राज्य दिवस Devbhoomi Lok K...

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Choliya Dance- A Folk Dance छलिया नृत्य हमारे उत्तराखण्ड के लोक नृत्यों में सबसे लोकप्रिय नृत्य है। यह नृत्य युद्ध के प्रतीक के रुप में ही प्रयोग किया जाता है, इसमें पुरुष प्राचीन सैनिकों जैसी वेश-भूषा धारण कर तलवार और् ढाल लेकर युद्ध जैसा नृत्य करते हैं। जिसमें उत्तराखण्ड के लोक वाद्य ढोल, दमाऊ, रणसिंग, तुरही और मशकबीन भी शिरकत करते हैं। इन सभी वाद्यों और छलिया नर्तकों की जुगलबन्दी ऐसी होती है कि आप दांतों तले अंगुली दबाने के लिये बाध्य हो जायेंगे। छलिया नृत्य का इतिहास नृत्य के दौरान संतुलन साध नर्तकी के लिये पैरों से मंच बनाते छोलिया छलिया नृत्य मूल में युद्ध का नृत्य है, इस नृत्य का समाज में प्रचलन विद्वानों के अनुसार अनुमानतः १० वीं सदी के आस-पास का माना जाता है। यह नृत्य युद्धभूमि में लड़ रहे शूरवीरों की वीरता के मिश्रित छल का नृत्य है। छल से युद्ध भूमि में दुश्मन को कैसे परास्त किया जा सकता है, यही इस नृत्य का मुख्य लक्ष्य है। इसी कारण इसे छल नृत्य, छलिया नृत्य और हिन्दी में छोलिया नृत्य कहा जाता है। प्रश्न यह भी उठता है कि यह नृत्य युद्ध भूमि से समाज में कैसे आया? पूर्व काल में...

माया को संसार New #Uttarakhandi Hit Song Latest 2018||DIWAN SAUN-MAYA KO...

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कुमाऊँनी लोकगीत मध्य हिमालय के नैनीताल, अल्मोड़ा, गढ़वाल, टेहरी, पिथौरागढ़, चमौली और उत्तर काशी में रहनेवाली पर्वतीय जातियों के गीत हैं। इन गीतों को दो भागों में बाँटा जा सकता हैं : 1-संस्कार के गीत, जो नारियों द्वारा पुत्रजन्म, नामकरण, यज्ञोपवीत एवं विवाह के समय गाए जाते हैं, तथा 2-मेलों, त्योहारों और ऋतुओं के गीत। इस क्षेत्र के प्राय: सभी संस्कार शंकुनाखरगीत से आरंभ होते हैं। इनमें गणेश, ब्रह्मा, राम तथा अन्य देवताओं से कार्यसिद्धि की प्रार्थना की जाती है। गीतों में मनुष्य, पशु, पक्षी संदेशवाहक का कार्य करते दिखाई पड़ते हैं, जो देवी देवताओं के अतिरिक्त दूरस्थ संबंधियों का भी संदेश ले जाते हैं। बिदाई के गीत अन्य स्थानों की तरह ही मार्मिक होते हैं। दूसरे प्रकार के गीतों में झोड़ा, चाँचरी भगनौल और बैर प्रमुख हैं। इन गीतों में सामाजिक जीवन एवं समस्याओं की विशेष चर्चा रहती है। ये विभिन्न मेलों एवं उत्सवों के अवसर पर गाए जाते हैं। इन्हें कई गायक अथवा गायिकाएँ मिलकर गाती हैं। ऋतुगीतों को यहाँ 'ऋतुरेण' कहते हैं। ये गीत चैत मास में गाए जाते हैं। ऋतुरेण में मंगलसूचक एवं प्राकृतिक सौंद...

बेडु पाको मसकबीन धुन पर छलिया नृत्य उत्तराखंड राज्य दिवस Devbhoomi Lok K...

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Choliya Dance- A Folk Dance छलिया नृत्य हमारे उत्तराखण्ड के लोक नृत्यों में सबसे लोकप्रिय नृत्य है। यह नृत्य युद्ध के प्रतीक के रुप में ही प्रयोग किया जाता है, इसमें पुरुष प्राचीन सैनिकों जैसी वेश-भूषा धारण कर तलवार और् ढाल लेकर युद्ध जैसा नृत्य करते हैं। जिसमें उत्तराखण्ड के लोक वाद्य ढोल, दमाऊ, रणसिंग, तुरही और मशकबीन भी शिरकत करते हैं। इन सभी वाद्यों और छलिया नर्तकों की जुगलबन्दी ऐसी होती है कि आप दांतों तले अंगुली दबाने के लिये बाध्य हो जायेंगे। छलिया नृत्य का इतिहास नृत्य के दौरान संतुलन साध नर्तकी के लिये पैरों से मंच बनाते छोलिया छलिया नृत्य मूल में युद्ध का नृत्य है, इस नृत्य का समाज में प्रचलन विद्वानों के अनुसार अनुमानतः १० वीं सदी के आस-पास का माना जाता है। यह नृत्य युद्धभूमि में लड़ रहे शूरवीरों की वीरता के मिश्रित छल का नृत्य है। छल से युद्ध भूमि में दुश्मन को कैसे परास्त किया जा सकता है, यही इस नृत्य का मुख्य लक्ष्य है। इसी कारण इसे छल नृत्य, छलिया नृत्य और हिन्दी में छोलिया नृत्य कहा जाता है। प्रश्न यह भी उठता है कि यह नृत्य युद्ध भूमि से समाज में कैसे आया? पूर्व काल मे...

माया को संसार New #Uttarakhandi Hit Song Latest 2018||DIWAN SAUN-MAYA KO...

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कुमाऊँनी लोकगीत मध्य हिमालय के नैनीताल, अल्मोड़ा, गढ़वाल, टेहरी, पिथौरागढ़, चमौली और उत्तर काशी में रहनेवाली पर्वतीय जातियों के गीत हैं। इन गीतों को दो भागों में बाँटा जा सकता हैं : 1-संस्कार के गीत, जो नारियों द्वारा पुत्रजन्म, नामकरण, यज्ञोपवीत एवं विवाह के समय गाए जाते हैं, तथा 2-मेलों, त्योहारों और ऋतुओं के गीत। इस क्षेत्र के प्राय: सभी संस्कार शंकुनाखरगीत से आरंभ होते हैं। इनमें गणेश, ब्रह्मा, राम तथा अन्य देवताओं से कार्यसिद्धि की प्रार्थना की जाती है। गीतों में मनुष्य, पशु, पक्षी संदेशवाहक का कार्य करते दिखाई पड़ते हैं, जो देवी देवताओं के अतिरिक्त दूरस्थ संबंधियों का भी संदेश ले जाते हैं। बिदाई के गीत अन्य स्थानों की तरह ही मार्मिक होते हैं। दूसरे प्रकार के गीतों में झोड़ा, चाँचरी भगनौल और बैर प्रमुख हैं। इन गीतों में सामाजिक जीवन एवं समस्याओं की विशेष चर्चा रहती है। ये विभिन्न मेलों एवं उत्सवों के अवसर पर गाए जाते हैं। इन्हें कई गायक अथवा गायिकाएँ मिलकर गाती हैं। ऋतुगीतों को यहाँ 'ऋतुरेण' कहते हैं। ये गीत चैत मास में गाए जाते हैं। ऋतुरेण में मंगलसूचक एवं प्राकृतिक सौंद...

माया को संसार New #Uttarakhandi Hit Song Latest 2018||DIWAN SAUN-MAYA KO...

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कुमाऊँनी लोकगीत मध्य हिमालय के नैनीताल, अल्मोड़ा, गढ़वाल, टेहरी, पिथौरागढ़, चमौली और उत्तर काशी में रहनेवाली पर्वतीय जातियों के गीत हैं। इन गीतों को दो भागों में बाँटा जा सकता हैं : 1-संस्कार के गीत, जो नारियों द्वारा पुत्रजन्म, नामकरण, यज्ञोपवीत एवं विवाह के समय गाए जाते हैं, तथा 2-मेलों, त्योहारों और ऋतुओं के गीत। इस क्षेत्र के प्राय: सभी संस्कार शंकुनाखरगीत से आरंभ होते हैं। इनमें गणेश, ब्रह्मा, राम तथा अन्य देवताओं से कार्यसिद्धि की प्रार्थना की जाती है। गीतों में मनुष्य, पशु, पक्षी संदेशवाहक का कार्य करते दिखाई पड़ते हैं, जो देवी देवताओं के अतिरिक्त दूरस्थ संबंधियों का भी संदेश ले जाते हैं। बिदाई के गीत अन्य स्थानों की तरह ही मार्मिक होते हैं। दूसरे प्रकार के गीतों में झोड़ा, चाँचरी भगनौल और बैर प्रमुख हैं। इन गीतों में सामाजिक जीवन एवं समस्याओं की विशेष चर्चा रहती है। ये विभिन्न मेलों एवं उत्सवों के अवसर पर गाए जाते हैं। इन्हें कई गायक अथवा गायिकाएँ मिलकर गाती हैं। ऋतुगीतों को यहाँ 'ऋतुरेण' कहते हैं। ये गीत चैत मास में गाए जाते हैं। ऋतुरेण में मंगलसूचक एवं प्राकृतिक सौंद...

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कुमाऊँनी लोकगीत मध्य हिमालय के नैनीताल, अल्मोड़ा, गढ़वाल, टेहरी, पिथौरागढ़, चमौली और उत्तर काशी में रहनेवाली पर्वतीय जातियों के गीत हैं। इन गीतों को दो भागों में बाँटा जा सकता हैं : 1-संस्कार के गीत, जो नारियों द्वारा पुत्रजन्म, नामकरण, यज्ञोपवीत एवं विवाह के समय गाए जाते हैं, तथा 2-मेलों, त्योहारों और ऋतुओं के गीत। इस क्षेत्र के प्राय: सभी संस्कार शंकुनाखरगीत से आरंभ होते हैं। इनमें गणेश, ब्रह्मा, राम तथा अन्य देवताओं से कार्यसिद्धि की प्रार्थना की जाती है। गीतों में मनुष्य, पशु, पक्षी संदेशवाहक का कार्य करते दिखाई पड़ते हैं, जो देवी देवताओं के अतिरिक्त दूरस्थ संबंधियों का भी संदेश ले जाते हैं। बिदाई के गीत अन्य स्थानों की तरह ही मार्मिक होते हैं। दूसरे प्रकार के गीतों में झोड़ा, चाँचरी भगनौल और बैर प्रमुख हैं। इन गीतों में सामाजिक जीवन एवं समस्याओं की विशेष चर्चा रहती है। ये विभिन्न मेलों एवं उत्सवों के अवसर पर गाए जाते हैं। इन्हें कई गायक अथवा गायिकाएँ मिलकर गाती हैं। ऋतुगीतों को यहाँ 'ऋतुरेण' कहते हैं। ये गीत चैत मास में गाए जाते हैं। ऋतुरेण में मंगलसूचक एवं प्राकृतिक सौंद...