रिश्तों की डोर उद्दगम की ओर UTTARAKHANDI NONSTOP SONGS UDGAM DIWAS DEVBH...

#देवभूमि लोक कला उद्दगम टीम मुंबई में अपनी उत्तराखंडी बोली भाषा लोक कला संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु मुंबई महानगर में कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजनकरते हैं जिसका उद्देश्य पहाडो़ में लुप्त हो रहे पुराने पारंपरिक रीति रिवाज और सांस्कृति धरोहर को मंचन करके लोगों में अपने पहाड़ और बिलुप्त हो रही संस्कृति लोक कला के प्रति जागरूक करना एवं उनको अपनाने हेतु प्रेरित करना है 

देवभूमि लोक कला उद्दगम मंच हर नये कार्यक्रम में उत्तराखंड से संबंधित मुद्दों की थीम पर कार्यक्रम आयोजित करता है पिछले वर्ष उद्दगम दिवस के सुअवसर पर भाई बहन के रिश्तों की डोर पर आधारित नाट्य भैटोली थीम पर सफल कार्यक्रम किया था जिसे सभी दर्शकों ने बहुत सराहा था इस वर्ष देवभूमि लोक कला उद्दगम मंच ने १६ अप्रैल २०१८ को उत्तराखंड में बहुचर्चित मुद्दा (पंचेश्वर बांध) प्रोजेक्ट थीम पर कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें पंचेश्वर बांध बनने से वहां पुश्तों से अपनी बुजुर्गों की सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर को संभाले हुवे लोगों का क्या होगा क्या वाकई जिनके गाँव घर जमीन और जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण और कभी ना भुला पाने वाली यादें हमेशा के लिए पंचेश्वर बांध प्रोजेक्ट के पानी में डूब जायेंगी पंचेश्वर बांध परियोजना से किसको कितना फायदा और नुकसान होगा यह तो समय ही बतलायेगा क्योंकि टिहरी बांध प्रयोजना से हमें बहुत कुछ देखने मिला है क्या वाकई टिहरी बांध बनने से घर जमीन से दूर हुये लोगों को अब तक सही मायने में न्याय मिल पाया है या नही सभी के सामने है हमें आज भी देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी का वह भाषण भली भाँति याद जब प्रचार प्रसार के समय मोदीजी ने हमारे पहाडो में आकर कहा था हम पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी को पहाडो से बाहर नही जाने देंगे लेकिन हमें क्या पता था कि जिस पानी को रोकने की बात मोदीजी कर रहें हैं एक दिन इसी बहते पानी को रोकने हेतु हमें अपना घर अपना गांव अपनी सांस्कृतिक धरोहर को हमेंशा के लिए छोड़कर कही दूर जाना पड़ेगा,पंचेश्वर बाँध उत्तराखंड राज्य में भारत-नेपाल सीमा पर बनने वाला बहुउद्देशीय बिजली परियोजना है 
उत्तराखंड में बन रहे पंचेश्वर बांध से 122 गांव डूब जाएंगे. यहां रहने वाले लोगों को सरकारों की चाहत से ही उजड़ना है और सरकारों के कहे पर ही कहींऔर बस जाना है पिथौरागढ़ के जौलजिबी में शारदा या महाकाली नदी नदियों के बहने के किस्से कई सदियों के हैं. जब से नदियां हैं तब से जब नदी नहीं होगी तब भी नदी को बहने से ही याद किया जाएगा उनका बहना ही उनका नदी होना है. उन्हें बांध देने के किस्से बस कुछ ही बरस पुराने हैं
आगे चलकर यह गंगा नदी में मिल जाती है। सिंचाई और जलविद्युत ऊर्जा के लिए बनाया जा रहा पंचेश्वर बांध, जो नेपाल के साथ एक संयुक्त उद्यम है, शीघ्र ही सरयू या काली नदी पर बनाया जाएगा। टनकपुर पनविद्युत परियोजना (१२० मेगावाट) अप्रैल १९९३ में उत्तराखंड सिंचाई विभाग द्वारा साधिकृत की गई थी, जिसके अंतर्गत चमोली के टनकपुर कस्बे से बहने वाली शारदा नदी पर बैराज बनाया गया। काली नदी गंगा नदी प्रणाली का एक भाग है। २००७ में काली नदी, गूँच मछ्लीयों के हमलो के कारण समाचारों में भी छाई।
सवाल यह भी उठ रहा है कि टिहरी बाँध के नाकाम हो जाने के बाद अब भी बांधों के लिए लालायित हो रही नौकरशाही व नेतृत्व के कौन से हित हैं जो अब पंचेश्वर बांध के लिए मंसूबे बांधे बैठे हैं। कुछ समय पूर्व 'नैनीताल समाचार' ने उत्तराखण्ड की नदियों पर प्रस्तावित छोटे-बड़े बाँधों को काले धब्बे से दर्शा कर एक नक्शा प्रकाशित किया था। नेपाल-उत्तराखण्ड के बीच बहने वाली काली नदी पर टिहरी से तीन गुना बड़े पंचेश्वर बाँध (पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना) पर सरकारी तौर पर सहमति नजर आ रही है।

पंचेश्वर बाँध: झेलनी ही होगी एक और बड़े विस्थापन की त्रासदीसैकड़ों बाँधों से लगभग पूरा नक्शा ही काला हो गया था। बाँधों से उभरी यह कालिख प्रतीकात्मक रूप में तथाकथित ऊर्जा प्रदेश के भविष्य को भी रेखांकित करती है।

वर्तमान में उत्तराखण्ड में सबसे बड़ा बाँध टिहरी बाँध है। बाँध निर्माण के पिछले चार वर्षों से इस पर बनी जलविद्युत परियोजना के जो परिणाम आ रहे हैं, उससे उत्तराखण्ड सरकार की ऊर्जा नीति सवालों के घेरे में आ गई है। दावा था कि टिहरी बाँध 2,400 मेगावाट विद्युत का उत्पादन करेगा। लेकिन पिछले चार सालों से टिहरी जल विद्युत परियोजना सिर्फ 1,000 मेगावाट विद्युत का उत्पादन ही कर पा रही है। सैकड़ों गाँवों, हजारों लोगों के विस्थापन के साथ उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण नागर सभ्यता को झील में डुबो देने वाले इस बाँध का औचित्य क्या है, यह समझ नहीं आ रहा है। बाँध से पूरे उत्तराखण्ड के विकास की उम्मींदें लगाए लोग विद्युत के इतने कम उत्पादन को देख हतप्रभ हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि टिहरी बाँध के नाकाम हो जाने के बाद अब भी बांधों के लिए लालायित हो रही नौकरशाही व नेतृत्व के कौन से हित हैं जो अब पंचेश्वर बांध के लिए मंसूबे बांधे बैठे हैं।
पंचेश्वर बाँध 315 मी. ऊँचा विश्व में दूसरा सबसे बड़ा बाँध होगा। इस बाँध की क्षमता 6,480 मेगावाट आंकी जा रही है। इस परियोजना पर दो चरणों में काम होना है। पहले 315 मीटर ऊँचा बाँध पंचेश्वर में महाकाली और सरयू नदी के संगम से 2 किमी नीचे बनना है। दूसरे चरण में 145 मीटर ऊंचाई वाला बाँध इससे नीचे महाकाली की अग्रगामी शारदा नदी पर पूर्णागिरी में। बाँध की इस बहुउद्देश्यीय परियोजना में भारत और नेपाल का 134 वर्ग किमी क्षेत्र डूब जाना है। इसमें भी 120 वर्ग किमी का क्षेत्र उत्तराखण्ड का है। सिर्फ 14 वर्ग किमी का क्षेत्र नेपाल का डूबेगा। दोनों ही ओर महाकाली और सहायक नदियों की उपजाऊ तलहटी में बसे प्रमुखतः कृषि पर जीवनयापन करने वाले 115 गांवों के 11,361 परिवार प्रभावित होंगे। ‘टिहरी विस्थापन’ से उबर भी न पाए उत्तराखण्ड के लोगों को एक और बड़े विस्थापन से जूझने की तैयारी करनी है।

Comments

Popular posts from this blog

Devbhomi Lok Kala Udgam Charitable Trust Mumbai

माया को संसार New #Uttarakhandi Hit Song Latest 2018||DIWAN SAUN-MAYA KO...

Lathi Tekde Bojho Bokde Devbhomi Lok Kala Udgam Charitable Trust