#'रिश्तों की ड़ोर उद्दगम की ओर (भेटौली) EMOTIONAL PROGRAME 2017 Devbhomi ...

#'रिश्तों की ड़ोर उद्दगम की ओर' 

#SINGER DIWAN SAUN BHETOLI THEEM EMOTIONAL PROGRAME AIROLI NAVI MUMBAI 
'रिश्तों की ड़ोर उद्दगम की ओर' 
चेत्र महिने में उत्तराखंड में सुप्रसिद्ध पर्व (भेटौली) भाई बहन के पवित्र रिश्तों की ड़ोर एवं भेटौई के अवसर पर भाई के ईन्तजार में बहिन की व्यथा को दर्शाता सांस्कृतिक कार्यक्रम मेहता कॉलेज ऐड़ोटेरियम सेक्टर 19 ऐरोली नवी मुंबई 
#SINGER DIWAN SAUN & GROUP JHUMILO OTUWA BE LENA UTTARAKHANDI HIT SONG
PLAYBACK SINGERS-DIWAN SAUN YOGENDRA BISHT MEGHA KANDPAL
ARTIST-GAYATRI BISHT SURESH BHATT POOJA BISHT MADHU PANYULI ANJU BHARDWAJ

उत्तराखंड में अनूठी है भाई-बहन के प्रेम की 'भिटौली' परंपरा
चैत्र माह में निभाई जाती है यह परंपरा, भाई देते हैं बहनों को सौगात

अनेक अनूठी परंपराओं के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखण्ड राज्य में भाई-बहन के प्रेम की एक अनूठी ‘भिटौली’ देने की प्राचीन परंपरा है। पहाड़ में सभी विवाहिता बहनों को जहां हर वर्ष चैत्र मास का इंतजार रहता है, वहीं भाई भी इस माह को याद रखते हैं और अपनी बहनों को ‘भिटौली’ देते हैं। 

घुघुती'भिटौली' का शाब्दिक अर्थ भेंट देने से हैं। प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा उस दौर में काफी महत्व रखती थी। इसके जरिए भाई-बहन का मिलन तो होता ही था, इसके जरिए उस संचार के साधन विहीन दौर में अधिकांशतया बहुत दूर होने वाले मायकों की विवाहिताओं की कुशल-क्षेम मिल जाती थी। भाई अपनी बहनों के लिए घर से हलवा-पूड़ी सहित अनेक परंपरागत व्यंजन तथा बहन के लिए वस्त्र एवं उपलब्ध होने पर आभूषण आदि भी लेकर जाता था। बाद के दौर में व्यंजनों के साथ ही गुड़, मिश्री व मिठाई जैसी वस्तुएं भी भिटौली के रूप में दी जाने लगीं। व्यंजनों को विवाहिता द्वारा अपने ससुराल के पूरे गांव में बांटा जाता था। भिटौली का विवाहिताओं को बेसब्री से इंतजार रहता था। भिटौली जल्दी आना बहुत अच्छा माना जाता था, जबकि भिटौली देर से मिली तो भी बहनों की खुशी का पारा-वार न होता था। आज के बदलते दौर में भिटौली की परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में तो कमोबेश पुराने स्वरूप में ही जारी है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भाइयों द्वारा ले जाए जाने वाले व्यंजनों का स्थान बाजार की मिठाइयों ने ले लिया है। भाई कई बार साथ में बहनों के लिए कपड़े ले जाते हैं, और कई बार इनके स्थान पर कुछ धनराशि देकर भी परंपरा का निर्वहन कर लिया जाता है।

लोकगीतों-दंतकथाओं में भी है भिटौली

भिटौली प्रदेश की लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसके साथ कई दंतकथाएं और लोक गीत भी जुड़े हुए हैं। पहाड़ में चैत्र माह में यह लोकगीत काफी प्रचलित है- 

ओहो, रितु ऐगे हेरिफेरि रितु रणमणी, हेरि ऐछ फेरि रितु पलटी ऐछ।

ऊंचा डाना-कानान में कफुवा बासलो, गैला-मैला पातलों मे नेवलि बासलि।।

ओ, तु बासै कफुवा, म्यार मैति का देसा, इजु की नराई लागिया चेली, वासा।

छाजा बैठि धना आंसु वे ढबकाली, नालि-नालि नेतर ढावि आंचल भिजाली।

इजू, दयोराणि-जेठानी का भै आला भिटोई, मैं निरोलि को इजू को आलो भिटोई।।

इस लोकगीत का कहीं-कहीं यह रूप भी प्रचलित है-

रितु ऐ गे रणा मणी, रितु ऐ रैणा।

डाली में कफुवा वासो, खेत फुली दैणा।

कावा जो कणाण, आजि रते वयांण।

खुट को तल मेरी आज जो खजांण।

इजु मेरी भाई भेजली भिटौली दीणा।

रितु ऐ गे रणा मणी, रितु ऐ रैणा।

वीको बाटो मैं चैंरुलो।

दिन भरी देली मे भै रुंलो।

वैली रात देखछ मै लै स्वीणा।

आगन बटी कुनै ऊँनौछीयो -

कां हुनेली हो मेरी वैणा ?

रितु रैणा, ऐ गे रितु रैणा।

रितु ऐ गे रणा मणी, रितु ऐ रैणा।।
पिथौरागढ में भिटौली पर 'चैतोल' की परंपरा

कुमाऊं के पिथौरागढ़ जनपद क्ष
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