#SINGER DIWAN SAUN JHUMILO OTUWA BE LENA UTTARAKHANDI HIT SONG Devbhomi ...
#SINGER DIWAN SAUN & GROUP JHUMILO OTUWA BE LENA UTTARAKHANDI HIT SONG
#BHETOLI THEEM UDGAM DIWAS 16 APRIL 2017 JVM MEHTA COLLAGE SECTOR-20 AIROLI NAVI MUMBAI Devbhomi Lok Kala Udgam Charitable Trust Mumbai
'रिश्तों की ड़ोर उद्दगम की ओर'
चेत्र महिने में उत्तराखंड में सुप्रसिद्ध पर्व (भेटौली) भाई बहन के पवित्र रिश्तों की ड़ोर एवं भेटौई के अवसर पर भाई के ईन्तजार में बहिन की व्यथा को दर्शाता सांस्कृतिक कार्यक्रम मेहता कॉलेज ऐड़ोटेरियम सेक्टर 19 ऐरोली नवी मुंबई
नमस्कार
देवभूमि लोक कला उद्दगम मंच के मुख्य उद्देश्य
देश विदेशों में उत्तराखंड एवं देश की संस्कृति को बढ़ावा देना!आपदाग्रस्तों भूकंपग्रस्तों एवं असहाय जरूरतमंदों की यथासंभव आर्थिक मदद करना
बच्चों पुरुषों एवं महिलाओं का मनोबल बढ़ाने एवं लोक कला संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु प्रेरित करना एवं उचित ट्रेनिंग देकर मंच प्रदान करना
देवभूमि लोक कला उद्दगम मंच उत्तराखंड के मुंबई प्रवासी कलाकारों का एक संगठित मंच है जो समय समय पर देवभूमि उत्तराखंड की लोक कलाओं एवं संस्कृति को विकसित करने हेतु मुंबई में धार्मिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं इसके अलावा देवभूमि लोक कला उद्दगम चैरिटेबल ट्रस्ट टीम आपदा पिढ़ितों अनाथाश्रमों एवं वृद्धाश्रमों में जरुरतमंदों की मदद के लिए सामाजिक कार्यक्रम करते रहते हैं!
मुंबई महानगर में कई पीढ़ियों से बसे उत्तराखंंड़ी बच्चे जो अपनी लोक कला संस्कृति के प्रति रुझान बढ़ा रहें हैं 200 से अधिक अनुभवी बच्चे, युवा एवं बुजुर्ग कलाकारों के संगम से देवभूमि लोक कला उद्दगम मंच को संजोया है उद्दगम मंच में उचित रियाज़ एवं रियलशल देने के बाद कलाकारों को मंच प्रदान कराते हैं जो गायन एवं नृत्य में बेहतरीन प्रस्तुतियाँ देकर अपनी संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं!
देवभूमि लोक कला उद्दगम मंच द्वारा अब तक प्रस्तुति एवं आयोजित किये धार्मिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम
1-16 अप्रेल 2016
2013 में केदारनाथ आपदा पीढ़ित बच्चों की मदद हेतु (महासंघ) के बैनर में भावनात्मक चैरिटी कार्यक्रम का ऐरोली नवी मुंबई में सफल आयोजन!
2- 30 जून 2016 पिथौरागढ़ के बस्तड़ी गाँव एवं चमोली जिले में बादल फटने और भारी बरसात से उत्तराखंड़ में भयंकर आपदा से ग्रस्त पिढ़ितों की मदद हेतु 30 जुलाई 2016 को नेरुल नवी मुंबई में भावनात्मक यादगार चैरिटी कार्यक्रम का सफल आयोजन!
3- 31 दिसंबर 2016 Mrs Uttarakhand 2017(Frist) (Pahadi Ramp Walk)
(अंगुठी मोबाइल पहाड़ी नथूली)
मुंबई महानगर में पहली बार उत्तराखंड़ी नारीशक्ति का मनोबल बढ़ाने और उत्तराखंड़ी लोक कला को बढ़ावा देने हेतु मिसेज उत्तराखंड मंच का निर्माण किया गया था जिसमें अपने परिधान लोक कलाओं एवं सांस्कृति का बेहतरीन प्रदर्शन एवं जानकारी रखने वाले 3 विजेता उत्तराखंड़ी महिलाओं को प्रोत्साहित करने हेतु अंगुठी मोबाइल और पहाड़ी नथूली उपहार स्वरुप दिये गये पहली बार मुंबई में 31 दिसंबर 2016 को Mrs Uttarakhand 2017 का ऐरोली नवी मुंबई में सफल आयोजन!
4- 16 अप्रेल 2017 भैटोली थीम पर बेहतरीन भावात्मक संगीतमय कार्यक्रम
देवभूमि उत्तराखंड़ में बिलुप्त हो रही सांस्कृतिक धरोहर भाई बहन के पवित्र रिश्तों की ड़ोर उत्तराखंड की पोराणिक सभ्यता "भैटोली" पर आधारित संगीतमय नाटिका सांस्कृतिक कार्यक्रम का ऐरोली नवी मुंबई में सफल आयोजन!
5- नंदादेवी राजजात महोत्सव एवं उद्दगम उत्तराखंड़ राज्य स्थापना दिवस 2017
नंदादेवी राजजात यात्रा सी बी ड़ी बेलापुर से ऐरोली नवी मुंबई तक पहली बार उत्तराखंड से आये ढ़ोल दमाँऊ छलिया दल के साथ राजराजेश्वरी माँ भगवती नंदा देवी की ड़ोली एवं कलश यात्रा का सफल आयोजन!
उद्देश्य
1- राजराजेश्वरी माँ भगवती नंदादेवी की ख्याति महिमा का एवं सांस्कृतिक धरोहरों नंदादेवी ड़ोली छलिया नृत्य ढ़ोल दमाँऊ कलश यात्रा का देश विदेशों में प्रचार प्रसार करना और अधिक लोगों को इस अभियान में जोढ़ने हेतु प्रयाशरत रहना है
2-उत्तराखंड राज्य बनाने हेतु अपने प्राणों की आहूति देने वाले अमर सहीदों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि!
3- शिक्षा खेल कूद में देश विदेशों उत्तराखंड़ एवं भारत देश का नाम रोशन करने वाले बच्चों को प्रोत्साहित करने हेतु समस्त समाज के सम्मुख सम्मान एवं गरीब स्कूली बच्चों जटिल रोगों से ग्रस्त लोगों को आर्थिक मदद करना!
6- 16 अप्रेल 2018 उद्दगम दिवस
उत्तराखंड में बनने जा ऐसिया का सबसे बढ़ा बाँध पंचेश्वर बाँध बनने से पीढ़ियों से बसे उत्तराखंड़ियों के विस्तापन के दर्द को दर्शाता संगीतमय नाटिका सांस्कृतिक कार्यक्रम का सफल आयोजन!
7- "जागर" राजराजेश्वरी माँ भगवती नंदादेवी राजजात महोत्सव मुंबई उत्तराखंड़ राज्य स्थापना दिवस 2018
उत्तराखंड़ का धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर "जागर" का लोक गायक जागर सम्राट श्री नैननाथ रावलजी श्री प्रकाश रावतजी एवं श्री रमेश जागरियाजी द्वारा मुंबई में पहली बार ढ़ोल दमाँऊ और हुड़कों में मंचन किया गया माँ नंदा भगवती की भव्य झाँकी ढ़ोल दमाँऊ छलिया नृत्य एवं कलश यात्रा के साथ सी•बी•ड़ी बेलापुर से ऐरोली नवी मुंबई तक सफल आयोजन!
आप सभी के स्नेह एवं आशिर्वाद से देवभूमि लोक कला उद्दगम चेरिटेवल ट्रस्ट भविष्य में मानवहित एवं देशहित में धार्मिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने की योजना कर रहे हैं आप सभी के साथ एवं आशिर्वाद हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद!
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उत्तराखंड में अनूठी है भाई-बहन के प्रेम की 'भिटौली' परंपरा
चैत्र माह में निभाई जाती है यह परंपरा, भाई देते हैं बहनों को सौगात
अनेक अनूठी परंपराओं के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखण्ड राज्य में भाई-बहन के प्रेम की एक अनूठी ‘भिटौली’ देने की प्राचीन परंपरा है। पहाड़ में सभी विवाहिता बहनों को जहां हर वर्ष चैत्र मास का इंतजार रहता है, वहीं भाई भी इस माह को याद रखते हैं और अपनी बहनों को ‘भिटौली’ देते हैं।
घुघुती'भिटौली' का शाब्दिक अर्थ भेंट देने से हैं। प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा उस दौर में काफी महत्व रखती थी। इसके जरिए भाई-बहन का मिलन तो होता ही था, इसके जरिए उस संचार के साधन विहीन दौर में अधिकांशतया बहुत दूर होने वाले मायकों की विवाहिताओं की कुशल-क्षेम मिल जाती थी। भाई अपनी बहनों के लिए घर से हलवा-पूड़ी सहित अनेक परंपरागत व्यंजन तथा बहन के लिए वस्त्र एवं उपलब्ध होने पर आभूषण आदि भी लेकर जाता था। बाद के दौर में व्यंजनों के साथ ही गुड़, मिश्री व मिठाई जैसी वस्तुएं भी भिटौली के रूप में दी जाने लगीं। व्यंजनों को विवाहिता द्वारा अपने ससुराल के पूरे गांव में बांटा जाता था। भिटौली का विवाहिताओं को बेसब्री से इंतजार रहता था। भिटौली जल्दी आना बहुत अच्छा माना जाता था, जबकि भिटौली देर से मिली तो भी बहनों की खुशी का पारा-वार न होता था। आज के बदलते दौर में भिटौली की परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में तो कमोबेश पुराने स्वरूप में ही जारी है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भाइयों द्वारा ले जाए जाने वाले व्यंजनों का स्थान बाजार की मिठाइयों ने ले लिया है। भाई कई बार साथ में बहनों के लिए कपड़े ले जाते हैं, और कई बार इनके स्थान पर कुछ धनराशि देकर भी परंपरा का निर्वहन कर लिया जाता है।
लोकगीतों-दंतकथाओं में भी है भिटौली
भिटौली प्रदेश की लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसके साथ कई दंतकथाएं और लोक गीत भी जुड़े हुए हैं। पहाड़ में चैत्र माह में यह लोकगीत काफी प्रचलित है-
ओहो, रितु ऐगे हेरिफेरि रितु रणमणी, हेरि ऐछ फेरि रितु पलटी ऐछ।
ऊंचा डाना-कानान में कफुवा बासलो, गैला-मैला पातलों मे नेवलि बासलि।।
ओ, तु बासै कफुवा, म्यार मैति का देसा, इजु की नराई लागिया चेली, वासा।
छाजा बैठि धना आंसु वे ढबकाली, नालि-नालि नेतर ढावि आंचल भिजाली।
इजू, दयोराणि-जेठानी का भै आला भिटोई, मैं निरोलि को इजू को आलो भिटोई।।
रुन झुन करती ऋतु आ गई है, ऋतु आ गई है रुन-झुन करती।
डाल पर 'कफुवा' पक्षी कूजने लगा, खेतों मे सरसों फूलने लगी।
आज तडके ही जब कौआ घर के आगे बोलने लगा।
जब मेरे तलवे खुजलाने लगे, तो मैं समझ गई कि -
माँ अब भाई को मेरे पास भिटौली देने के लिए भेजेगी।
रुन झुन करती ऋतु आ गई है, ऋतु आ गई है रुन-झुन करती।
मैं अपने भाई की राह देखती रहूंगी।
दिन भर दरवाजे मे बैठी उसकी प्रतीक्षा करुँगी।
कल रात मैंने स्वप्न देखा था।
मेरा भाई आंगन से ही यह कहता आ रहा था -
कहाँ होगी मेरी बहिन ?
रुन झुन करती ऋतु आ गई है, ऋतु आ गई है रुन-झुन करती।।
वहीं ‘भै भुखो-मैं सिती’ नाम की दंतकथा भी काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बहन अपने भाई के भिटौली लेकर आने के इंतजार में पहले बिना सोए उसका इंतजार करती रही। लेकिन जब देर से भाई पहुंचा, तब तक उसे नींद आ गई और वह गहरी नींद में सो गई। भाई को लगा कि बहन काम के बोझ से थक कर सोई है, उसे जगाकर नींद में खलल न डाला जाए। उसने भिटौली की सामग्री बहन के पास रखी। अगले दिन शनिवार होने की वजह से वह परंपरा के अनुसार बहन के घर रुक नहीं सकता था, और आज की तरह के अन्य आवासीय प्रबंध नहीं थे, उसे रात्रि से पहले अपने गांव भी पहुंचना था, इसलिए उसने बहन को प्रणाम किया और घर लौट आया। बाद में जागने पर बहन को जब पता चला कि भाई भिटौली लेकर आया था। इतनी दूर से आने की वजह से वह भूखा भी होगा। मैं सोई रही और मैंने भाई को भूखे ही लौटा दिया। यह सोच-सोच कर वह इतनी दुखी हुई कि ‘भै भूखो-मैं सिती’ यानी भाई भूखा रहा, और मैं सोती रही, कहते हुए उसने प्राण ही त्याग दिए। कहते हैं कि वह बहन अगले जन्म में वह ‘घुघुती’ नाम की पक्षी बनी और हर वर्ष चैत्र माह में ‘भै भूखो-मैं सिती’ की टोर लगाती सुनाई पड़ती है। पहाड़ में घुघुती पक्षी को विवाहिताओं के लिए मायके की याद दिलाने वाला पक्षी भी माना जाता है। ‘घुर-घुर न घुर घुघुती चैत में, मकें याद उं आपणै मैत की’ जैसे गीत भी काफी लोकप्रिय हैं।
पिथौरागढ में भिटौली पर 'चैतोल' की परंपरा
कुमाऊं के पिथौरागढ़ जनपद क्षेत्र में चैत्र मास में भिटौली के साथ ही चैतोल पर्व मनाए जाने की एक अन्य परंपरा भी है। चैत्र मास के अन्तिम सप्ताह में मनाये जाने वाले इस त्योहार में पिथौरागढ के समीपवर्ती गांव चहर-चौसर से डोला यानी शोभायात्रा भी निकाली जाती है, जो कि निकट के 22 गांवों में घूमती है। चैतोल के डोले को भगवान शिव के देवलसमेत अवतार का प्रतीक बताया जाता है, डोला पैदल ही 22 गांवों में स्थित भगवती देवी के थानों यानी मंदिरों में भिटौली के अवसर पर पहुंचता है। मंदिरों में देवता किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित होकर उपस्थित लोगों व भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।
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